खामोश संकेतों को पढ़ती तकनीक: स्किन कैंसर के खिलाफ AI की भूमिका - KL University

स्किन कैंसर अक्सर बिना शोर किए शुरू होता है। त्वचा पर हल्का सा रंग बदलना, किनारे का थोड़ा असमान हो जाना या कोई छ

स्किन कैंसर अक्सर बिना शोर किए शुरू होता है। त्वचा पर हल्का सा रंग बदलना, किनारे का थोड़ा असमान हो जाना या कोई छोटा सा निशान, जो आम तौर पर नज़रअंदाज़ हो जाता है। लेकिन डॉक्टरों के लिए यही छोटे बदलाव सबसे बड़ी चुनौती होते हैं। सही समय पर सही पहचान करना अनुभव, समय और गहरी नज़र पर निर्भर करता है। जैसे-जैसे दुनिया भर में स्किन कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं, गलती की गुंजाइश कम होती जा रही है। ऐसे में तकनीक अब सिर्फ मददगार नहीं, बल्कि इलाज की प्रक्रिया में एक भरोसेमंद साथी बनती जा रही है।

हाल ही में Q2 Scopus-indexed जर्नल Intelligence-Based Medicine में प्रकाशित एक शोध इसी दिशा में एक अहम कदम है। यह शोध KL University के कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. धुलिपल्ला रम्या कृष्णा द्वारा किया गया है। इस अध्ययन में बताया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस किस तरह स्किन कैंसर की पहचान में न केवल अधिक सटीकता ला सकता है, बल्कि डॉक्टरों को यह भी समझा सकता है कि मशीन ने किसी नतीजे तक कैसे पहुंचा, Best Universities in India

शोध का मुख्य फोकस इस बात पर है कि मशीनें मेडिकल इमेज को कैसे सीखें। स्किन कैंसर के कई प्रकार देखने में काफी हद तक एक जैसे होते हैं, जबकि कुछ खतरनाक प्रकार बहुत कम मामलों में दिखाई देते हैं। ऐसे असंतुलन के कारण मशीनों के लिए सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इस समस्या को हल करने के लिए शोध में एक ऐसा फ्रेमवर्क प्रस्तावित किया गया है, जो असली तस्वीरों के साथ-साथ समझदारी से बनाई गई इमेज से भी सीखता है। इससे दुर्लभ लेकिन गंभीर मामलों को भी ट्रेनिंग के दौरान बराबर महत्व मिल पाता है।

इस अध्ययन की एक खास बात यह है कि यह सिर्फ हर पिक्सल को एक जैसा नहीं देखता। मॉडल को इस तरह तैयार किया गया है कि वह उन हिस्सों पर ज्यादा ध्यान दे, जो मेडिकल रूप से अहम होते हैं। जैसे घाव के असमान किनारे, हल्के बनावट के बदलाव और संरचना में आई गड़बड़ी। यह तरीका ठीक वैसा ही है, जैसा डॉक्टर जांच के दौरान अपनाते हैं। इससे मशीन भी उन संकेतों को बेहतर समझ पाती है, जो बीमारी की सही पहचान में मदद करते हैं।

यह शोध सिर्फ तकनीकी प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। यह हेल्थकेयर में हो रहे एक बड़े बदलाव को भी दिखाता है, जहां भरोसा और समझदारी उतनी ही जरूरी है जितनी सटीकता। जब इलाज में AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, तो यह जानना भी जरूरी है कि मशीन क्या सोच रही है और क्यों। यह काम AI को डॉक्टरों का विकल्प बनाने के बजाय उनके फैसलों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम प्रयास है।

KL University का कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और हेल्थकेयर कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में लगातार शोध को आगे बढ़ा रहा है। फैकल्टी के नियमित शोध प्रकाशन, फंडेड प्रोजेक्ट्स और छात्रों द्वारा किए जा रहे इनोवेशन के जरिए यह विभाग तकनीक को समाज से जोड़ने का काम कर रहा है। इस तरह का शोध न सिर्फ ज्ञान को आगे बढ़ाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ी को वास्तविक दुनिया की चुनौतियों के लिए भी तैयार करता है।


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